ग़रीब बच्चों की ज़िंदगी सँवारने की कोशिश में लगे हैं डीयू के ये छात्र

नई दिल्ली: बदन पर पसीने का बोझ, न सर पर ढकी छत और थाली में आधी रोटी. कुछ ऐसा ही जीवन होता है स्लम मे रहने वाले सैंकड़ों बच्चों के माँ बाप का. ऐसे में स्कूल जाना, बड़े घरों के बच्चों की तरह लंच बॉक्स में सैंडविच खाना तो दूर ये बच्चे सपने होते क्या हैं ये तक नहीं समझ पाते. कपड़ों के छोटे- छोटे छेदों से झांकता इनका जीवन गरीबी से उठकर गन्दगी के अभाव में ही जान दे देता है. ऐसे में संतोष सागर सेवा संस्थान स्लम के बच्चों को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने की दिशा में काम कर रहा है. ये संस्था पिछले दो साल से महिला सशक्तिकरण और बस्तियों में रहने वाले बच्चों के स्वास्थ्य और सफ़ाई के लिए कई प्रकार से काम कर रही है. खुशियां बाँटने से बढ़ती हैं. संतोष सेवा संसथान के सदस्य हर त्योहार इन बच्चों के साथ बस्तियों में मानते हैं. उनके चेहरे की ख़ुशी और हसी ही इन लोगों के लिए ईद पर मिलने वाली ईदी जैसी है. इस स्वैच्छिक संघठन की स्थापना 2017 में ललित यादव ने की. 

कौन है झुग्गियों का मसीहा?

संतोष सेवा संस्थान की नीव 2017 में समाज सेवी ललित यादव ने रखी. उनकी माता बताती हैं कि ललित को बचपन से ही गरीब और बेसहारा बच्चों के प्रति सहानुभूति रही है और वे हमेशा से ही समाज के लिए अपना योगदान देने की इच्छा रखते हैं. ललित ने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढाई आरम्भ की. फिलहाल ललित यादव महर्षि दयानन्द कॉलेज के लोक प्रशासन भिवाग से पीएचडी कर रहे हैं. एमफिल के दौरान उन्हें उनके अनुसंधान के लिए गोल्ड मैडल से नवाज़ा गया था. महिला सशक्तिकरण पर आधारित उनका काम किताबों के माध्यम से दुनिया के सामने है.

ललित 2013 से ही भिन्न एनजीओ के साथ काम करते आ रहे हैं. उन्हें समाज में उनके योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. सोसाइटी डेवलपमेंट अवार्ड- 2018 , युथ आइकॉन अवार्ड- 2018  और प्राइड ऑफ़ सोसाइटी हीरो अवार्ड- 2018  पर उनका नाम दर्ज है. ललित ने स्लम में जाकर उन बच्चों की मदद की जो समाज से खुदको अलग महसूस करते थे. वे इन बच्चों को मुफ्त शिक्षा देते हैं. उनका मानना है की समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए ज़रूरी है की पहले बच्चे शिक्षित हों. ललित और उनकी टीम झुग्गियों में रहने वाले बच्चों और महिलाओं को हफ्ते में तीन दिन पढ़ाते हैं.

नियमित कॉउन्सिलिंग के ज़रिये बच्चों का विकास और करियर का ध्यान रखा जाता है. जिसने कभी रंग न देखें हो उसके लिए अपना हुनर पहचान पाना कठिन हो सकता है. ललित की संस्था इन बच्चों को मुफ्त किताबे, रंग और स्टेशनरी का सामान जैसे पेंसिल, कॉपी, आदि मुहैया कराती है. साथ ही ठण्ड के मौसम में जहाँ ये बच्चे तन पर फटे कम्बल लपेटकर सोते हैं, संतोष सेवा संस्थान इन बच्चों के बीच जाकर इन्हे स्वेटर, टोपी, और बाकी कपडे बांटती है. रचनात्मक कार्यों जैसे नाच, गाना, पेंटिंग, नुक्कड़ नाटक के माध्यम से इन बच्चों के समावेशी विकास का ध्यान रखा जाता है.

त्योहार से एक हफ्ते पहले ही एनजीओ द्वारा  बस्ती  में लगातार अलग अलग कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. मिठाइयां बाँटी जाती हैं, नाच गाना होता है और गिफ्ट  वितरित किये जाते हैं. इस वर्ष दिवाली के अवसर पर रोड किनारे सामान बेचने वाले गरीब परिवार से मिटटी के बने दिए खरीदे गए और इन बच्चों मे बांटे गए. इस प्रकार गरीब परिवार को दिवाली पर चंद पैसे मिल गए और झोपड़ियों में रहने वाले इन बच्चों को जगमग दिये. साथ ही इस बार दिवाली के जश्न को बच्चों के लिए और उमंगी बनाने आरजे अनामिका ने खुद इन बच्चों के बीच आकर खीर बाँटी.

 संतोष सेवा संस्थान किसी से कोई नकद सहायता की अपेक्षा नहीं रखता. जो कोई भी स्वेच्छा से मदद करना चाहता है वो खुद आकर इन बच्चों के बीच समय बिता सकता है और चाहे तो सामान भी बाँट सकता है. इन बच्चों के जीवन को संवारने के लिए ललित 25000 रूपए खुद अपनी जेब से खर्चा करते हैं. ललित कहते हैं, ‘आप भी अपने आस पास के गरीब बच्चों के साथ खुशियों को बांटने का प्रयास करें क्योंकि ये बच्चे ही देश का आने वाला कल हैं. ये बच्चे बेहतर भारत का निर्माता बन सकते हैं. एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सबका यह कर्त्तव्य है की हम बच्चों के उज्जवल भविष्य के निर्माता के रूप में अपनी भूमिका निभाएं.’ जब सपनो को पर मिल जाए तो उड़ान भी लम्बी होती है. ललित की संस्था का यूट्यूब चॅनेल भी है जिसपर वक्त बे वक्त वो इन बच्चों में छिपी प्रतिभाओं को दुनिया के सामने लाते हैं.  

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